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“बाटा गोडाई क्या तेरो नौ च, बोल भौराणी कख तेरो गों च” और पंडित विशालमणि शर्मा

“बाटा गोडाई क्या तेरो नौ च, बोल भौराणी कख तेरो गों च” और पंडित विशालमणि शर्मा

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by December 29, 2018 Literature

उत्तराखंड के पहले प्रकाशक पं विशालमणि सेमवाल/शर्मा

कल्पना करें कि, आज से ठीक 100 वर्ष पहले यानि 1917 के ऊपरी गढ़वाल की। भौगोलिक दृष्टि से एक सीमान्त क्षेत्र की। एक ऐसा पिछड़ा क्षेत्र जहां से नजदीकी बस सुविधा लगभग 200 किलोमीटर दूर ऋषिकेश में थी। कोई पक्का मकान भी न था। मकान की छतों को घास से ढ़का जाता था। बिजली तो दूर मिट्टी तेल भी रोशनी के लिए उपलब्ध होना एक बड़ी लक्ज़री मानी जाती थी। ऐसे समय और स्थितियों में पुस्तक मुद्रण और प्रकाशन की सूचना क्या एक सपना नहीं लगता? पर इस सपने को भी सार्थक किया एक नवयुवक ने जिसका नाम था- विशालमणि सेमवाल। जिन्हें हम विशालमणि शर्मा उपाध्याय के नाम से जानते हैं।

यह वह समय था जब विशालमणि जी के आसपास के इलाके में गायत्री मंत्र मुंह के बाहर उच्चारित कर बोलना भी पाप माना जाता था। अधिकतर मंत्र और पूजा विधान गुप्त माने और रखे जाते थे। इस सबके बावजूद उन्होंने इन मंत्रों और पूजा विधानों को प्रकाशित करने का साहस दिखाया। उन्हें जान से मारने की धमकियां मिली पर वे अपने उद्देश्य से नहीं डिगे। उन्होंने अपने लेखन के लिए मुकदमें झेले पर, सत्य का आग्रह नहीं छोड़ा। पंडित विशालमणि शर्मा का जन्म रूद्रप्रयाग जिले में गुप्तकाशी के निकट घघोरा ग्राम में 1894 ई॰ में हुआ था। इनके पिताजी ईश्वरी दत्त एक सुप्रसिद्ध ज्योतिषी एवं वैद्य थे। अपने तीन भाईयों में विशालमणि सबसे बड़े थे। प्रारम्भिक शिक्षा बामसू (लमगोन्डी) में ही प्राप्त कर 9 वर्ष की उम्र में ही पारम्परिक पुरोहितवृति में पारंगत हो गये थे। घर से डेढ़ किलोमीटर दूर बाणासुर मन्दिर में नंगे पैर आते-जाते थे। कई बार रास्ते में बर्फ पड़ी होती थी जो कि बालक विशालमणि की परीक्षा की घड़ी होती थी। पर वे धैर्य से इस बर्फ से जूझते हुए समय में मन्दिर पहुंच जाते थे और ये ही जुझारूपन उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया।

मिडिल स्कूल की शिक्षा के लिए ऊखीमठ स्थित विद्यालय में प्रवेश लिया पर पुरोहितवृति भी साथ-साथ चल ही रही थी। पुरोहितवृति में उनका मन नहीं लगता था, उनका मन कविता और कहानी जैसी साहित्यिक विधाओं में कल्पना की उड़ान भरता था। अतः मिडिल स्कूल के इन दिनों से ही हिन्दी और गढ़वाली में तुकबन्दी करने लगे थे।

मिडिल स्कूल परीक्षा उत्रीर्ण करने के पश्चात् फिर पुरोहितवृति पूर्णकालीन व्यवसाय बन रहा था। इसी दौरान उन्हें शब्द की मुद्रित शक्ति का आभास हुआ, जोकि आष्चर्य ही है क्योंकि उस समय भौगोलिक दृश्टि से एक पिछड़े क्षेत्र में जहां से नजदीकी बस सुविधा 200 किलोमीटर दूर ऋशिकेष में थी, मुद्रण और प्रकाशन की बात सोचना भी एक सपने जैसा था।

मैदानी भ्रमण की ललक उन्हें रायबरेली खींच लाई। वहां पर राजघराने के व्यक्तियों को अपनी ज्योतिशीय चमत्कारिता दिखाने के बाद उन्होंने वहां से कुछ पुस्तिकाओं (बुकलेट) का प्रकाशन करवा लिया जिनमें कुछ गढ़वाली लोकगीत, धार्मिक कर्मकाण्ड, केदारनाथ बद्रीनाथ गंगोत्री यमनोत्री पर कुछ पर्यटन जानकारी तथा तंत्रमंत्र और वैद्यकी शामिल थे।

जनता ने बड़े उत्साह से इन पुस्तिकाओं (बुकलेट्स) का स्वागत किया। इससे विशालमणि का आत्मविश्वास बढ़ा और वे इन पुस्तिकाओं के संशोधन में लग गये। शीतकाल में जब केदारनाथ के कपाट बंद हो जाते थे तब वे दिल्ली, मथुरा, मुरादाबाद जाकर संशोधित पुस्तिकाओं के प्रूफ रीडिंग कर, मुद्रण करवाकर प्रकाशित करने लगे। अपने प्रकाशन का नाम उन्होंने ‘विशाल कार्यालय’ रखा और सन् 1919 में नारायणकोटि (गुप्तकाशी) में इसकी स्थापना की। तब नारायणकोटि केदारनाथ पैदल मार्ग पर एक छोटी बस्ती के रूप में था जहां तीर्थ यात्री आते-जाते समय विश्राम करते थे। तत्पश्चात विशालमणि ने गढ़वाल के कई कवि और लेखकों की रचनाओं का प्रकाशन कर उनका उत्साहवर्धन किया। इसमें मुख्य हैं- पंडित बालकृष्ण भट्ट की कनकवंश डाॅ॰ शिव प्रसाद डबराल की उतराखंड यात्रा दर्शन, गोविन्द चातक की छुमा तथा हरी दूब (कहानी संग्रह), तोता कृष्ण गैरोला की प्रेमी पथिक, आचार्य श्रीधर जमलोकी की अश्रुमाला तथा दुन्दभी डिमडिम, प्रभुदत् ब्रह्मचारी की श्री बद्रीनाथ दर्शन, स्वामी बुद्धिचन्द्र पुरी की श्री बद्री केदार यात्रा इत्यादि। ज्योतिश पर उनकी प्रकाशित पुस्तकों ने पुरोहित कर्म के प्रति कई लोगों को अनुशासित किया। अनेक ब्राह्मणों की जीविका को सुव्यस्थित किया एवं इनके अनुशीलन से कई छात्रों ने पुरोहितवृत्ति अपनायी। ये पुस्तकें संदर्भ ग्रन्थों के रूप में आज भी जानी जाती हैं। इन पुस्तकों की उस समय जम्मू-कश्मीर , मध्यप्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र में बहुत मांग थी। उस समय ही नहीं वरन आज भी पुरोहितवृति में लगे गढ़वाल, कुमाऊँ एवं हिमाचल प्रदेश के ब्राह्मण पूजा भास्कर और कर्मकाण्ड भास्कर को दिन-प्रतिदिन के पूजा आयोजनों में प्रयोग करते हैं।

गढ़वाली का सुप्रसिद्ध और लोकप्रिय लोकगीत रामी बौराणी जिसकी शुरूआत “बाटा गोडाई क्या तेरो नौ च, बोल भौराणी कख तेरो गों च” से होती है, भी सर्वप्रथम विशालमणि शर्मा जी ने ही प्रकाशित किया था। इस गीत के रचनाकार पंडित बलदेव प्रसाद शर्मा ‘दीन’ को माना जाता है। अधिकतर गढ़वाली भाषा के विद्वान मानते हैं कि यह गाथा पहले से गायी जाती रही होगी जिसे बलदेव प्रसाद शर्मा ‘दीन’ ने संवार कर प्रस्तुत किया। वे विशालमणि शर्मा जी के पड़ोसी गांव बामसू (लमगोन्डी) के रहने वाले थे।

दुर्भाग्यवश विशालमणि जी किसी विशेष विषय पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाये और विभिन्न विषयों पर लिखते, संकलित करते और पुस्तक प्रकाशित करते रहे। उन्होंने अनेक पुस्तकों का संकलन एवं सम्पादन किया, इनमें प्रमुख हैं- पूजा भास्कर, कर्मकाण्ड भास्कर, पितृकर्म पद्धति, संस्कार पद्धति, दुर्गा कल्पद्रुम, शक्ति तोशणी, शान्ति पद्धति, सदाचार चन्द्रिका, गिरिजा शंकर गुटिका इत्यादि। कर्मकाण्ड के अलावा अनेक ज्योतिष विषय संबंधित पुस्तकों का भी संकलन एवं संपादन किया। जिसमें ज्योतिष भास्कर, पंचांग भास्कर, ताजिक भास्कर, ताजिक चन्द्रिका, जातक दीपिका इत्यादि प्रमुख हैं।

स्वामी योगेन्द्र पुरी द्वारा रचित पुस्तकों जिनका प्रकाषन विषालमणि षर्मा जी ने ‘फलकण्डी‘ एवं ‘फूलकण्डी’ नाम से किया था, के परिषिश्ट में एक लेख में उन्होंने केदारनाथ के पंडा-तीर्थ पुरोहितों की जाति के बारे में एक अवांछनीय टिप्पणी कर दी। फलस्वरूप उन्हें कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़े। 20 वीं सदी के तीसरे दषक में जब औसत आय कुछ रूपये मात्र ही थी, में उन पर जिला अदालत द्वारा पाँच सौ रुपये का जुर्माना हुआ। 1935 ई॰ में सेषन कोर्ट में सेषन जज ने उनकी अपील पर सुनवाई की। सेषन जज श्री राजकिषोर सिंह ने महर्शि पाराषर की मछुवारे की बेटी के साथ हुई षादी और तत्पष्चात् उत्पन्न पुत्र वेदव्यास का उदाहरण देते हुए उन्हें फलकण्डी और फूलकण्डी भविश्य में इस रूप में न प्रकाषित करने का निर्देष दिया।

पं॰ विशालमणि शर्मा द्वारा हिन्दी और गढ़वाली साहित्य में योगदान को आज के मापदण्डों पर तय करना मुश्किल होगा किन्तु यह मानना पड़ेगा कि 1920-1930 के समय ऊपरी गढ़वाल के सीमान्त क्षेत्र में जहां साइकिल देखना भी दुर्लभ था, बस या टैक्सी की तो कल्पना भी नहीं हो सकती, उनका मुद्रण और प्रकाशन का कार्य अग्रणी था। उन्होंने पुस्तकों से सम्बन्धित कई गतिविधियों को एक साथ प्रारम्भ किया था। वे लिखते थे दूसरों से लिखाते थे, प्रकाशित करते थे, दूसरों की पुस्तक प्रकाशित करते थे, पुस्तकों का मुद्रण करवाते थे, पुस्तकें खरीदते थे, भण्डारण करते थे और पुस्तकें बेचते थे। उनके ग्राहकों में रतलाम (मध्यप्रदेश) और देवास के लोग भी थे।

प्रसिद्ध विद्वान राहुल सांकृत्यायन ने उनके बारे में लिखा था- “श्री विशालमणि जी संस्कृत के पंडित हैं, बहुश्रुत हैं और भारत में काफी भ्रमण कर चुके हैं। उन्होंने इस दुर्गम पर्वत के साधारण स्थान में पुस्तक प्रकाशन करके लोगों को काफी लाभ पहुंचाया है।”

प्रसिद्ध इतिहासकार डाॅ॰ शिव प्रसाद नैथानी ने अपनी पुस्तक ‘उत्रराखण्ड का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूगोल’ में लिखते हैं कि “डाॅ॰ डबराल के इस मत से हम सहमत हैं कि उत्तराखंड का इतिहास अति प्राचीन होने पर भी उसका उत्तराखंड नाम नवीन है”…… शैक्षिक और सांस्कृतिक संस्था के रूप में हमें केदारघाटी में गुप्तकाशी के निकट ‘उतराखंड विद्यापीठ’ का नाम स्मरण करना होगा जिसके निष्ठावान अध्यापकों/आचार्यों ने उत्तराखंड शब्द को लोकप्रिय बनाने में विशाल कार्यालय नारायणकोटि के प्रकाशक विशालमणि शर्मा से मिलकर उत्तराखंड शब्द के प्रचार में अनेक प्रकार से सहयोग दिया और केदारखण्ड से भी अधिक इस शब्द का जन-जन में प्रचलन कर दिया था।

विशालमणि जी एक बड़े समाज सुधारक थे। समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरूद्ध वे समाज को जागृत करते रहते थे। अपने कई सूची पत्रों तथा पुस्तकों के शुरूआत के पृष्ठों पर वे समाज सुधार के आशय की अपील छापते थे। जैसे पूजा भास्कर के तीसरे संस्करण के चौथे पृष्ठ पर ही देखिए “शारदा बिल कानून सन 1930 ई॰ की 1 जुलाई से सारे ब्रिटिश भारत के लिए पास हो चुका है। जिसकी सूचना पेस्तर कई जगह छप गई है। 18 वर्ष से कम उम्र का लड़का और 14 वर्ष से कम उम्र की लड़की का ब्याह करने पर उन दोनों के घरवालों को और बारात के ब्राहमण, पाहुने तथा बाजे बजाने वालों को भी एक हजार रुपए तक जुर्माना और सजा जो हाकिम की इच्छा हो मिल रही है तौ भी अज्ञानी लोग अभी तक समझे ही नहीं। इस सुधार के लिए एक मुकदमा पेश किया जा रहा है। जिससे कन्या विक्रय बन्द हो”- ‘विशाल’

विशालमणि जी का व्यक्तित्व एक विद्रोही का व्यक्तित्व था अपनी बात निर्भय होकर कहते रहे। अपनी प्रतिक्रिया तुरन्त व्यक्त करने के कारण वे स्थानीय स्तर पर लोकप्रिय नहीं थे, पर लोक के हित के लिए जितना कर सकते थे, लगातार करते रहे। किसी पार्टी या झण्डे में भी उनका विश्वास नहीं रहा। समाज की बुराइयों और अंधविश्वासों पर लगातार प्रहार करते रहे।

पारिवारिक जिम्मेदारियों को भी शर्मा जी ने बखूबी निभाया। उन्होंने अपने चारों पुत्रों को अच्छी शिक्षा दिलाई। उनके पहले पुत्र का देहान्त हो चुका है। दूसरे पुत्र कर्नल जे0के0 शर्मा भारतीय सेना से 1971 के पाकिस्तान युद्ध में पैर में गोली लगने के बाद सेवानिवृत हुए हैं। तीसरे पुत्र श्री दया कृष्ण शर्मा केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग से निदेशक पद से सेवानिवृत हुए हैं और पिता की आनुवंशिकता को सतत रखते हुए ज्योतिष पर पुस्तकें लिख रहे हैं तथा प्रकाशित कर रहे हैं। चौथे पुत्र डाॅ॰ रामकृष्ण शर्मा उत्तराखण्ड के सुदूर क्षेत्रों में अपने चिकित्सकीय ज्ञान का अनुभव आम आदमी तक पहुंचाते हुए सेवानिवृत हुए हैं।

सन् 1979 में पं॰ विशालमणि शर्मा जी का देहान्त हो गया। शर्मा जी द्वारा लिखित एवं प्रकाशित पुस्तके अब क्षीणता एवं अप्राप्ति की तरफ बढ़ रही है। आवश्यकता है उन्हें संजोया जाए। उत्तराखंड सरकार के संस्कृति विभाग एवं सामाजिक संस्थाओं को इस पुण्य कार्य में आगे बढ़ना चाहिए। उनके नाम से एक प्रकोष्ठ उत्तराखंड के किसी भी विश्वविद्यालय/संस्थान के पुस्तकालय में खोला जा सकता है। जहां इन अमूल्य पुस्तकों का संरक्षण हो सके और नई पीढ़ियों को ज्ञान के इस भण्डार से परिचित कराया जा सके। ये ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


Dr Om Prakash Jamloki, Mirror
omprakashjamloki@gmail.com

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