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Category Archives: Literature

‘काऽरि तु कब्बि ना हाऽरि’, उत्तराखंड के शैक्षिक और सामाजिक इतिहास की झलक दिखाती एक जीवनी

‘काऽरि तु कब्बि ना हाऽरि’, उत्तराखंड के शैक्षिक और सामाजिक इतिहास की झलक दिखाती एक जीवनी

‘‘…तब इलाके में वधू-मूल्य चुकाने का चलन था। लड़के वाले कन्या पक्ष को नगदी में चांदी के कळदार तो देते ही थे, ऊपर से खुशामदें भी करते थे। वधू के Continue Reading »

कौन हैं पहाड़ों के नये ककड़ी चोर, किसने चुराई भागीरथी आमा की ककड़ी, पढ़िए आपको जड़ों से जोड़ता ये आलेख

कौन हैं पहाड़ों के नये ककड़ी चोर, किसने चुराई भागीरथी आमा की ककड़ी, पढ़िए आपको जड़ों से जोड़ता ये आलेख

पहाड़ों की पहाड़ जैसी जिन्दगी जीते-जीते बहुत बड़ा बदलाव हो गया। चंद राजाओं की प्राचीन राजधानी चंपावत के आसपास कई गांव हैं। ये गांव भी इस बदलाव से अछूते नहीं Continue Reading »

पढ़िए कैसे उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक प्रतिनिधि हैं लोकोत्सव और मेले – डा. नंदकिशोर हटवाल

पढ़िए कैसे उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक प्रतिनिधि हैं लोकोत्सव और मेले – डा. नंदकिशोर हटवाल

उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक प्रतिनिधि हैं लोकोत्सव और मेले उत्सव, मेले और त्योहारों का मनुष्य के सामाजिक जीवन में अहम् स्थान होता है। वो किसी भी देश, धर्म, सम्प्रदाय में निवास Continue Reading »

‘को बणौल पधान’, एक कुमांउनी भाषा की कविता, पंचायत चुनाव पर लेखक के विचार

‘को बणौल पधान’, एक कुमांउनी भाषा की कविता, पंचायत चुनाव पर लेखक के विचार

हलचल हैरै आब ऐगी चुनाव, फेसबुक मुबाईल में मारण रयी उच्छयाव। क्वें जोड़न लागि रयीं आब हाथ, क्वें चाण फैगी आब दयाप्तों थान।  गौनूँक बाखई में या माल धारकिं दुकान, गौ गौनूंमें सब Continue Reading »

शूरवीर रावत की लिखी पुस्तक ‘मेरे मुल्क की लोककथाएं’ की समीक्षा डा. नंदकिशोर हटवाल द्वारा

शूरवीर रावत की लिखी पुस्तक ‘मेरे मुल्क की लोककथाएं’ की समीक्षा डा. नंदकिशोर हटवाल द्वारा

मेरे मुल्क की लोककथाएं क्या आपने ये किस्सा सुना है कि एक शादी में लड़की वालों ने लड़के वालों के सामने शर्त रखी कि बाराती सभी जवान आने चाहिए, बूढ़ा Continue Reading »

पहाड़ी नेताओं पर निशाना साधने वाला कुमाऊंनी तरीके का तीखा व्यंग्य

पहाड़ी नेताओं पर निशाना साधने वाला कुमाऊंनी तरीके का तीखा व्यंग्य

सोशल मीडीया में एक मैसेज बहुत आ रहा है कि माननीयो ने अपनी तो तनख्वाह बड़ा दी है, और सरकारी नौकरों की क्यों नहीं बड़ी , कह रहे ये कैसा Continue Reading »

“बाटा गोडाई क्या तेरो नौ च, बोल भौराणी कख तेरो गों च” और पंडित विशालमणि शर्मा

“बाटा गोडाई क्या तेरो नौ च, बोल भौराणी कख तेरो गों च” और पंडित विशालमणि शर्मा

उत्तराखंड के पहले प्रकाशक पं विशालमणि सेमवाल/शर्मा कल्पना करें कि, आज से ठीक 100 वर्ष पहले यानि 1917 के ऊपरी गढ़वाल की। भौगोलिक दृष्टि से एक सीमान्त क्षेत्र की। एक Continue Reading »

कहीं धीरे-धीरे खत्म तो नहीं हो रही हैं गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषाएं

कहीं धीरे-धीरे खत्म तो नहीं हो रही हैं गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषाएं

भारत कई भाषाओं की भूमि है। एक लोकप्रिय कहावत है “कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी” मतलब भारत एक ऐसी जगह है जहाँ हर कुछ किलोमीटर में Continue Reading »

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