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पैनखण्डा : बदरीनाथ के अलावा भी बहुत कुछ है यहां, एक पर्यटन स्थल डा. हटवाल के साथ

पैनखण्डा : बदरीनाथ के अलावा भी बहुत कुछ है यहां, एक पर्यटन स्थल डा. हटवाल के साथ

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by December 6, 2019 Tour/Travel

अगर घूमने के लिए आपको किसी ऐसी जगह की तलाश है जहां आपको तीर्थ के साथ प्रकृति के खूबसूरत नजारे भी दिखें, ट्रैकिंग भी हो, नदियां, झरने, फूलों की घाटियां, ग्लेशियर, ताल-झील, ग्लेशियर, पर्वतचोटियां, हिलस्टेशन, बुग्याल, गर्मपानी के श्रोत, स्कीइंग, राष्ट्रीय पार्क एवं परिजीवी मंडल के दर्शन भी एक ही भौगोलिक क्षेत्र में हो जाय। तो एक बार पैनखण्डा जरूर आएं। यह क्षेत्र आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा। यही नहीं यहां के विशिष्ठ उत्सव, मेले-त्योहार, गीत-संगीत भी आपका मन मोह लेंगे। उत्तराखण्ड जिन विशिष्ठताओं और सुंदरता के लिए देश-दुनिया में जाना जाता है आपको वो सब पैनखण्डा में देखने को मिल जायेगा। पैनखण्डा क्षेत्र वर्तमान में जोशीमठ विकासखण्ड के नाम से जाना जाता है। यह जनपद चमोली का तिब्बत से लगा सीमान्त विकासखण्ड है। जोशीमठ इसका मुख्यालय है तथा इसे आप भारत का अंतिम हिलस्टेशन भी कह सकते हैं। यह रेलवे स्टेशन ऋषिकेश से 260 जौनीग्रांट हवाई अड्डे से 290 किमी की दूरी पर ।

चार धामो में एक धाम बदरीनाथ इसी क्षेत्र में है। और इसके अलावा यहां और भी बहुत कुछ है। यहां खूबसूरत स्थलों, दर्शनीय बुग्यालों और ताल-झीलों की भरमार है। पैनखण्डा के प्रवेशद्वार पर गरूड़गंगा है। यह स्थान अलकनंदा की सहायक नदी गरूड़ गंगा के किनारे स्थित है। यहां पर गरूड़ मंदिर है। इसके बाद हेलंग नामक स्थान है जो कि छोटा सा पहाड़ी कस्बा है। स्थानीय लोग इस स्थान को ‘तिरपणी’ कहते हैं। तिरपणी का अर्थ है ‘तीन पाणी’ अर्थात तीन नदियों का संगम। त्रिवेणी का तद्भव। इस स्थान पर दोनो ओर से अलकनंदा की दो सहायक नदियां-कल्प गंगा और हेलंग गाड़ का अलकनंदा में संगम होता है। कल्पगंगा द्वारा निर्मित घाटी में खूबसूरत उर्गम घाटी बसी है।

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इसी उर्गम घाटी में पंच केदारों में प्रथम केदार कल्पनाथ और पंच बदरी में एक बदरी ध्यान बदरी है। यहां फ्यूला नारायण तथा उर्वाऋषि मंदिर भी हैं। हेलंग से आगे अणिमठ में वृद्ध बदरी का मंदिर है इसके बाद जोशीमठ आता है।

चित्र-रविग्राम का फुलकोठा

जोशीमठ में ज्योतिर्मठ, शंकराचार्य गुफा, नृसिंह मंदिर दर्शनीय है। यह एक खूबसूरत हिल स्टेशन है। यहां पर कैम्प कर आप विश्व हिमक्रीड़ा केन्द्र औली, ग्वरसों बुग्याल, क्वांरी पास घूम सकते हैं। जोशीमठ से नीती घाटी की ओर भविष्य बदरी, बांककुण्ड, तपोवन, मलारी, ढामर सैंण, टिमरसैंण मादेव आदि दर्शनीय स्थल हैं। अगर आप राष्ट्रीय पार्क एवं वन्य जीव विहार घूमने के शौकीन हों तो इस छोटे से इलाके में फूलों की घाटी राष्ट्री उद्यान, नंदादेवी वन्यजीव विहार और नंदा देवी परिजीवि मण्डल स्थित हैं। जोशीमठ से बदरीनाथ रोड़ पर गोविंदघाट है। यहां से फूलों की घाटी और सिखों के प्रसिद्ध तीर्थ हेमकुण्ड जाते हैं। पैनखण्डा में विश्वप्रसिद्ध फूलों की घाटी के अलावा एक और फूलों की घाटी है जिसे चिनाब घाटी कहा जाता है। इसके बारे में कम लोग जानते हैं। यह भी किसी विश्वप्रसिद्ध फूलों की घाटी से कम मनमोहक नहीं। गोविंद घाट से 1 किमी पर पाण्डुकेश्वर है। यहां पर पंचबदरी श्रृंखला का एक मंदिर योगबदरी है। आगे विश्वप्रसिद्ध बदरीनाथ धाम है। जहां प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में तीर्थ यात्री आते हैं। भारत का अंतिम गांव माणा, बसुधारा, भीमपुल, शेषनेत्र आदि बदरीनाथ के आसपास के दर्शनीय स्थल हैं।

( चित्र-भीम पुल)

ट्रैकिंग के लिए भी पैनखण्डा क्षेत्र बहुत मुफीद है। पंचकेदार ट्रैक, फूलों की घाटी, औली-गुरसों, क्वारी पास ट्रैक, रूद्रनाथ-कल्पनाथ ट्रैक, काकभुशुन्डी ट्रैक, चिनाब घाटी ट्रैक, मलारी से मिलम ट्रैक आदि इस क्षेत्र के मनमोहक ट्रैक हैं। जोशीमठ इन पथारोहण का सबसे बेहतर बेस कैम्प है। ट्रैकिंग करते हुए आपको कई प्रकार की वृक्ष प्रजातियां के दर्शन होंगे। बांज, बुरांस के साथ काफल, अंयार, खरसू भोजपत्र आदि वृक्ष प्रजातियां दिखेंगी। चौड़ी पत्ती वाले मिश्रित वनों के ऊपर नुकीली पत्तियों वाले वनों से गुजरने का भी आपको सुयोग मिलेगा। रागा, देवदार, सुरई, कैल, खरसू आदि वृक्षों की छांव में आप विश्राम फरमा सकते हैं। वंशीनाराण, मनपाई, माणा, फूलों की घाटी, काकभुसुण्डी, नीती, द्रोणागिरि, क्वांरी पास, चेनाब, आदि इस क्षेत्र के प्रसिद्ध व रमणीक बुग्याल हैं जो वर्षा काल में स्थानीय लोगों के भेड़ व पशुपालन के उत्तम क्षेत्र हैं। इन बुग्यालों में आप कैम्प कर प्रकृति का भरपूर आनंद उठा सकते हैं, यह क्षेत्र पश्चिम हिमालय की महान तथा मध्य हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं के अंतर्गत आता है। यहां विश्वप्रसिद्ध ऊँची पर्वत चोटियों, तीव्र पर्वतीय ढालों, गहरी नदी-घाटियों की सुंदरता विद्यमान है। नंदा देवी, त्रिशूल, नंदाकोट, द्रोणागिरि, माणा, नीलकंठ, चौखम्भा, स्वर्गारोहिणी, कामेट, नर पर्वत, नारायण पर्वत, हाथी पर्वत, कुन्ती भनार, सतोपंथ आदि पर्वत चोटियां हैं जहां प्रतिवर्ष पूरी दुनियां से पर्वतारोही पर्वतारोहण के लिए आते हैं।

हिमालय की नदियों की पवित्रता और निर्मलता देखनी हो तो यह क्षेत्र बहुत बेहतर होगा। इस क्षेत्र में प्रचुर जल संसाधन है। पैनखण्डा उत्तरी अलकनंदा के जलागम क्षेत्र में फैला है। जहां कई हिमनद क्षेत्र, बर्फाच्छादित चोटियां तथा अनेक सतत वाहिनी नदियां, झीलें व ताल हैं। पैनखण्डा की प्रमुख नदी अलकनंदा है। अलकनंदा की अनेक महत्वपूर्ण सहायक नदियां के यहां दर्शल होंगे। सरस्वती, धौली गंगा, गिरथी गंगा, ऋषि गंगा, कोसा गाड़, भ्यूंडार गाड़, गरुड़ गंगा, कल्प गंगा, खिरो गाड़, गणेश गंगा, विष्णु गंगा, पाताल गंगा, दूधगंगा आदि जल धराएं आपके मन को मोह लेंगी। तालों की बात करें तो हेमकुण्ड, काकभुसुण्डी ताल, सतोपंथ, नंदीकुड, बांककुण्ड, ऋषिकुण्ड आदि ताल हैं। बदरीनाथ और तपोबन में गर्म पानी के श्रोत हैं। तपोवन से आगे साकिनधार में गर्म पानी का फव्वारा देखने लायख है। यह क्षेत्र सांस्कृतिक रूप से भी संपन्न है। सांस्कृतिक उत्सवों के मौकों पर यहां आएं तो प्राकृतिक की सुंदरता और तीर्थ-पर्यटन के साथ-साथ यहां के उत्सवों का भी आनंद उठा सकते हैं। चैत्र मास में सम्पूर्ण क्षेत्र में फूलदेयी त्यौहार मनाया जाता है। इसमें बच्चे घरों में जाकर फूलों को डालते हैं। बैसाख मास की संक्रांति तो सारे पैनखण्डा में विविधता के साथ मनाई जाती है। इसी दिन से विश्वधरोहर रम्माण की शुरूवात होती है तथा लगभग ग्यारह-तेरह दिन बाद यह आयोजित होता है। लाता गांव की बैशाखी देखने लायख होती है। इस अवसर पर लाता में विभिन्न प्रकार के नृत्यों का आयोजन होता है।
चित्र-द्वींग गांव में आयोजित घ्वड़ीत

भादो के महीने शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को पूरे पैनखण्डा में नंदाष्टमी मनाई जाती है। इस अवसर पर छोटी-छोटी यात्राओं का आयोजन किया जाता है। इसी महीने अष्टमी तिथि के बाद जो द्वादशी तिथि आती है वो बावन द्वादशी कहलाती है। इस दिन माणा में मातामूर्ति का मेला होता है। इन उत्सवों के अलावा गमशाली गांव का बैरी तोको, निति-माणा घाटी के लास्पा उत्सव, उर्गम घाटी का दशमी मेला, गौरा-शिव विवाह, बड़ागांव का हस्तोला, जोशीमठ का तिमुण्ड्या कौथीग, भरपूजा, पाण्डुकेश्वर का जांति मेला, रविग्राम का फुलक्वोठा दर्शनीय हैं। पैनखण्डा में कतिपय स्थानो पर समय-समय पर मुखौटा नृत्य का भी आयोजन किया जाता है। चैत्वोला कौथीग, स्यल्पाती, हस्तोला, जुगात, जाख-चण्डिका द्यवोरा, पाण्डव-बग्ड्वाल नृत्य आदि कई दर्शनीय सांस्कृतिक उत्सव हैं। तीर्थ और पर्यटन, खूबसूरत प्रकृति और इस प्रकृति में लिपटे, रचे-बसे मन को मोहित करने वाले सांस्कृतिक आयोजन।… और क्या चाहिए! बस मन बनाइए और एक बार पैनखण्डा में दो-चार दिन के लिए जरूर आइए!


डा. नंद किशोर हटवाल, देहरादून

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