Skip to Content

कहीं धीरे-धीरे खत्म तो नहीं हो रही हैं गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषाएं

कहीं धीरे-धीरे खत्म तो नहीं हो रही हैं गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषाएं

Be First!
by May 8, 2018 Literature

भारत कई भाषाओं की भूमि है। एक लोकप्रिय कहावत है “कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी”
मतलब भारत एक ऐसी जगह है जहाँ हर कुछ किलोमीटर में बोली जाने वाली भाषा पानी के स्वाद की तरह बदल जाती है भारत का संविधान देश की विभिन्न हिस्सों में बोली जाने वाली 23 आधिकारिक भाषाओं और दो आधिकारिक शास्त्रीय भाषाओं, संस्कृत और तमिल को मान्यता देता है।

आज स्कूल अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में छात्रों को तेजी से प्रशिक्षण दे रहे हैं और स्थानीय भाषाओं को कम वरीयता देते हैं,
भारत के पास भाषाओं के संदर्भ में समृद्ध विरासत है और यहां तक कि सबसे दूरस्थ क्षेत्रों द्वारा बोली जाने वाली हर भाषा को अनुच्छेद 29 और अनुसूची VIII की पसंद के माध्यम से संविधान द्वारा सम्मानित किया जाता है।

भारत दुनिया के उन देशों में है, जहां सबसे ज्यादा भाषाएं बोली जाती हैं लेकिन सबसे भाषाएं लुप्त भी हो जाती हैं। प्राचीन भारत में, संस्कृत सबसे प्रचलित भाषा थी, केंद्र सरकार ने लुप्त हो रही भाषाओं को संरक्षित करने के लिए वर्ष 1969 को मैसूर कर्नाटक में सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वेज (सीआईआईएल) की स्थापना की। 2013 के मध्य में, संस्थान, जो मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन है, को लुप्तप्राय भाषाओं (एसपीपीईएल) के संरक्षण और संरक्षण के लिए योजना के तहत कार्य दिया गया था। प्रत्येक लुप्त भाषा एक संस्कृति और परंपराओं को बहुत दूर लेकर जाती है।

भारतवर्ष के उत्तर में स्थित पहाड़ी राज्य उत्तराखंड ऐतिहासिक और प्रशासनिक कारणों से मुख्य रूप से दो भागों में बंटा है: कुमाऊँ और गढ़वाल | मैं यहा उत्तराखण्ड राज्य की दो प्रमुख पहाड़ी भाषाएँ, कुमाऊंनी और गढ़वाली के बारे में बताने जा हू। राज्य सरकार गढ़वाली और कुमाउंनी बोली को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल किए जाने के लिए कोशिश कर रही है।

मातृभाषा जिसे दुधबोली भी कहते हैं अर्थात् वह भाषा जो हम अपनी मां के मुख से सुनते हैं, फिर बोलते हैं।
कुमाउंनी भाषा में कुछ सुंदर शब्द जैसे हम ओह मेरे भगवान नहीं कहते हैं! हम कहते हैं ओह इजा! (ओह मेरे प्यारे / मां), हम शब्द “साथ” का उपयोग नहीं करते – हम “दगढ़ी” का उपयोग करते हैं हमारे पास “दादा-दादी” नहीं है, हमारे पास “अम्मा – बुबू” है। हम “घबराते” नहीं, हम “गजबाजा” जाते है। हम “चावल” नहीं खाते हैं, हम “भात” खाते हैं माथू माथू – धीरे धीरे। ऐसे कई शब्द है जो पहाड़ी भाषा की मिठास को बताने के लिए काफ़ी है।

अपने राज्य की भाषा को बचाने के लिए देश के छोटे से राज्य गोवा ने इसी वर्ष से प्राथमिक कक्षाओं में इसे पढ़ाए जाने का आदेश जारी किया है। देश के सभी पहाड़ी राज्यों में स्थानीय भाषाएं सरकारी संरक्षण में फल-फूल रही हैं। भाषा पढ़ायी नहीं जाएगी तो धीरे-धीरे उसकी व्यावहारिकता कम हो जाएगी। उत्तराखंड की संस्कृति और साहित्य के प्रोत्‍साहन के लिए लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में भी कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषा, संस्कृति से संबंधित प्रश्न पूछे जाने चाहिए। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उत्तराखण्ड की लोक भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए सोशल मीडिया में गढ़वाली, कुमाउंनी और उत्तराखण्ड की अन्य बोली भाषा में संवाद करना शुरू किया है।

गूगल इंडिया ने भी ये बताया है कि क्षेत्रीय भाषाओं में अधिक डिजिटल सामग्री का निर्माण भारत को एक अरब डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था बनने में बड़ा योगदान दे सकता है। एक स्टडी के अनुसार भारत में 234 मिलियन स्थानीय भाषा उपयोगकर्ता हैं। 2021 तक यह संख्या 536 मिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है। कर्नाटक राज्य सरकार ने सभी मेट्रो स्टेशन से हिंदी साइन बोर्ड हटाए और साथ ही घोषणाओं से भी हिंदी को हटा दिया ताकि उनकी कन्नड़ भाषा को एक नयी पहचान मिल सके। यह रोजगार के लिए भी महत्वपूर्ण है। सुरक्षा का मुद्दा ले लो। माओवादी प्रभावित छत्तीसगढ़ में, स्थानीय भाषा बोलने वाले आदिवासियों और हिंदी भाषी बलों के बीच गलतफहमी जीवन की हानि का कारण बनती है।

हमें एक नहीं, अनेक भाषाएं सीखनी चाहिए, परन्तु सबसे अच्छी बात तो यह होगी कि हम अपनी मां को न भूलें, अपनी क्षेत्रीय भाषा को न भूलें। चाहे वो हरियाणवी हो, बंगाली हो या कोई ओर भाषा हो ।


नीतीश जोशी
बागेश्वर, उत्तराखंड

(हमसे जुड़ने के लिए CLICK करें)
( CLICK here for latest news headlines)

( अपने विचार और आर्टिकल हमें mirroruttarakhand@gmail.com पर भेजें)

Previous
Next

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Loading...
Loading...