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उत्तराखंड – इन दो शहीदों के सवालों का जवाब कौन देगा, पढ़िए इनकी बहादुरी के बदले क्या मिला इन्हें

उत्तराखंड – इन दो शहीदों के सवालों का जवाब कौन देगा, पढ़िए इनकी बहादुरी के बदले क्या मिला इन्हें

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by February 24, 2019 News

जवान अपना सब कुछ भूल कर अपने जीवन को देश के लिए कुर्बान कर देते हैं और शहीद हो जाते हैं दुश्मनों से जंग करते हुए, ताकि उनके देश के लोग सुरक्षित रह सकें और सीमा पर होने वाली घटनाओं से दूर अपने घरों में आराम से सो सकें। शहीदों के परिवारों को कोई दिक्कत ना हो, उनके बच्चे भी आम बच्चों की तरह आगे बढ़ सकेंं, ये जिम्मेदारी होती है देश की और सरकार की । अधिकतर देश इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाता भी है, लेकिन कभी – कभी हम अपनी जवानों की शहादत को भूल जाते हैं और जवानों का परिवार भारी दुख सहने को मजबूर हो जाता है।

यहां पहली तस्वीर जो आप देख रहे हैं वो बीएसएफ के जवान एसआई रामचंद्र सिंह राणा की है, आठ साल पहले 20 सितंबर 2011 को जम्मू के सांबा में बीएसएफ के जवान एसआई रामचंद्र सिंह राणा शहीद हुए थे। शहादत की सूचना के बाद रामचंद्र सिंह राणा के साकेत कॉलोनी अजबपुर कला देहरादून स्थित आवास पर जन सैलाब उमड़ा था। तत्कालीन मुख्यमंत्री सहित दर्जनों नेता परिजनों को सांत्वना देने उनके घर पहुंचे।  इस दौरान सरकार ने शहीद के परिजनों से वादा किया था कि प्रदेश सरकार आपके साथ है। जितना हो सकता है सरकार मदद करेगी, लेकिन रामचंद्र सिंह राणा की शहादत को सरकार भूल गई। पिछले आठ साल में राज्य सरकार से परिवार को कोई मदद नहीं मिली। शहीद की पत्नी बेरोजगार बेटे की नौकरी के लिए भटक रही है। मुख्यमंत्री से लेकर जिलाधिकारी सहित अन्य उच्चाधिकारियों को कई बार इस संबंध में पत्र लिख चुकी हैं, लेकिन सरकार अर्द्धसैनिक बलों की शहादत का कोई मायने नहीं समझ रही है। 

दूसरी तस्वीर कारगिल युद्ध में अपने प्राणों की आहुति देने वाले उत्तराखंड के शहीद मातबर सिंह कंडारी की है, कारगिल में मातवर सिंह कंडारी की शहादत के बाद सरकार ने बेटे को नौकरी और एक पेट्रोल पंप देने की घोषणा की थी। लेकिन 20 साल बाद भी न पेट्रोल पंप मिला और न ही बेटे को कोई नौकरी। उस समय बेटा जयकृत कक्षा दस की पढ़ाई कर रहा था। अब 20 साल बाद भी शहीद कंडारी के बेटे जयकृत कंडारी इन दिनों प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं और दून के कारगी चौक पर किराए के कमरे में रहते हैं। जयकृत ने बताया कि नौकरी के संबंध में कई बार विधायकों और नेताओं से बात की गई। लेकिन नौकरी की समस्या दूर नहीं हो सकी। ऐसे में पेट्रोल पंप की तो बात ही करना बेमानी है।

आज जब हम अपने शहीदों को याद कर रहे हैं, ऐसे में हमें अपने शहीदों की पीड़ा को भी समझना चाहिए और हो सके तो सरकारों को इन शहीदों की मदद के लिए आगे आना चाहिए। आप भी इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि सरकार उन तक इन शहीदों की पीड़ा पहुंच सके !

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