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उत्तराखंड के प्रसिद्ध गोलू देवता की जीवन कथा, न्याय के लिए हैं प्रसिद्ध

उत्तराखंड के प्रसिद्ध गोलू देवता की जीवन कथा, न्याय के लिए हैं प्रसिद्ध

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by February 4, 2019 Culture

गोलू देवता की कहानी के पिछले हिस्से में आपने पड़ा कि नवजात गोलू देव को उनकी सात सौतेली मां एक लोहे के संदूक में डालकर नदी में बहा देती हैं…

( पिछले हिस्से की कहानी पड़ने के लिए क्लिक करें )

कथा का अगला भाग..

सातों रानियो ने बालक को लोहार द्वारा बने लोहे के संदूक में लिटाकर और सन्दूक में ताला लगा कर काली नदी में बहा दिया, हवा और सुर्य प्रकाश से वर्जित वो संदूक 7 दिन और 7 रात बहता बहता गोरी नदी के गोरीघाट में पहुंचा। नवजात बालक 7 दिन और 7 रात सन्दूक में बिना हवा बिना सुर्य प्रकाश और बिना भोजन रहा, गोरीघाट पर भाना नाम के मछुवारे के जाल में वह संदूक फंस गया। उसने सोचा कोई बडी मछली फंस गई, लेकिन् जब बक्सा खोलते ही दूध से गोरे नवजात को देखा तो वो दंग रह गया, उसने बिना देर किये अपनी पत्नी को बूलाया, दोनो इतना रूपवान बालक देख कर दंग रह गए, मछुवारा नि:संतान था, दोनो के मन में बालक को देख कर सन्तान माया जाग गई । इसलिए उन्होने बालक को भगवान का प्रसाद मान कर पालने का फैसला किया, जैसे ही स्त्री ने बालक को गोद में लिया, उसके स्तनों से दूध बहने लगा, जो एक चमत्कार था, बालक के गोरी घाट पर मिलने से बालक का नाम गोरिया और गोलू रखा गया, बालक के जन्म के समय ठीक श्री कृष्ण जैसी लीला होने के कारण गोलू देव को श्री कृष्ण अवतारी कहा गया, और गोलू देव भगवान भैरव के अवतार हैं और भैरव रूप में उन्हे शक्तिया प्राप्त हैं और दूध जैसे गोरे रंग के कारण उन्हे गौर भैरव नाम मिला…….
( इससे आगे की कहानी के लिए हमारे साथ बने रहें, अगले अंक में हम कथा के अगले हिस्से में गोलू देव के लालन-पालन के बारे में जानेंगे । )

रोचक जानकारी..

( श्री गोलू देवता को ही पौड़ी गढ़वाल में कण्डोलिया देवता नाम से पूजा जाता है क्योकि नेगी जाति के लोग गोल्जू को “कण्डी” में लाये थे, पहले उन्होने इनकी स्थापना पौड़ी गांव के चौक में की थी लेकिन यह स्थान गहराई में होने के कारण गोल्जू ने स्वयं को शिखर पर स्थापित करने को कहा। इसलिये गोल्जू की पौड़ी नगर के शीर्ष शिखर पर स्थापना की गई तथा स्थानीय क्षेत्रपाल के रूप में देवता की पूजा की जाने लगी। क्योंकि इनको यहां कण्डी में लाया गया था अत: इनको “कन्डोलिया देवता” के नाम से जाना जाने लगा। आसपास का क्षेत्र भी कण्डोलिया के नाम से पहचाना जाने लगा। समाज में कण्डोलिया देवता की बोलन्दा देवता के रुप में पूजा की जाती है। कण्डोलिया देवता किसी घटना या विपत्ति का पूर्वाभास होते ही सारे नगर को आवाज लगाकर सचेत कर देते है )

इंतजार करिये क्योंकि उत्तराखंड में न्याय के देवता के रूप में जाने जाने वाले गोलू देव की खुद की कहानी भी संघर्ष से भरी हुई है ।

भैरव जोशी ( उत्तराखंड निवासी भैरव जोशी दिल्ली में टाटा ग्रुप ऑफ होटल्स में कार्यरत हैं और उत्तराखंड की दैवीय संस्कृति की इनको विशेष जानकारी है, इनके ज्ञान को अब हम आप लोगों तक पहुंचाएंगे )

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