
Uttarakhand श्राद्ध और पहाड़, सराद का भात, एक रोचक लेख श्राद्ध की परंपरा पर
बातों बातों में :- पिताजी का श्राद्ध और सराद का भात (लेखक द्वारा ये आर्टिकल अपने स्वर्गीय पिताजी की याद में लिखा गया है ) : फिल्म ‘झुक गया आसमान’ का गीत सुना ही होगा-“जिस्म को मौत आती है लेकिन, रूह को मौत आती नहीं है”। रूह (आत्मा) अजर-अमर कही जाती है। माना जाता है कि आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। श्रीमद् भागवत के अनुसार जन्म लेने वाले की मृत्यु और मृत्यु को प्राप्त होने वाले का जन्म निश्चित है। जीवन-मरण का ये चक्र प्रकृति का नियम है। सनातनी संस्कृति का लोक विश्वास है कि व्यक्ति अपने जीवन काल में किये कर्मों के अनुसार पाप और पुण्य का भागी होता है। अच्छे कर्मों से उसे स्वर्ग लोक तथा बुरे कामों से नरक भोगना पड़ता है, भावनात्मक लगाव के कारण पितर लोक में रहने वाले पित्रों की याद उनके वंशजों को अवश्य आती है और पितृऋण चुकाने के लिये उनकी श्रद्धा सदैव बनी रहती है। इसी निमित्त श्राद्ध में दान-पुण्ड किया जाता है। पुराणों में भी कहा गया है कि एक निश्चित समय पर विधि विधान से अपने पितरों को श्रद्धा पूर्वक याद किए जाने वाला कर्म ही श्राद्ध है। हमारी लोक आस्था ये भी है कि श्राद्ध से प्रसन्न होकर पितृगणों द्वारा अपने वंशजों को विद्या, धन, आयु, आरोग्य और संतान सुख का आशीर्वाद मिलता है। विधि पूर्वक, शांतचित्त और पूर्ण श्रद्धा से श्राद्ध किए जाने पर व्यक्ति का परिवार फलता-फूलता है।
बात अगर सिर्फ पहाड़वासियों की करें तो यहाँ के लोगों में श्राद्ध के प्रति अटूट आस्था है। अपने पहाड़ की परम्परा है कि पितरों की संतानें अपने स्वजन की मृत्यु के बाद उसकी पुण्यतिथि को प्रति वर्ष एकोदिष्ट सराद करते हैं, श्राद्ध पक्ष में पार्वण श्राद्ध करते हैं, साथ ही मांगलिक कार्यों के समय भी आभ्यूदयिक (आभदेव) श्राद्ध कर पितरों का आशीर्वाद लिया जाता है। इसके अलावा कुछ तीर्थों और नदी तटों में भी श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध किये जाते हैं। भाद्रपद(भादो) शुक्ल की पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक पितृपक्ष (सोलह सराद) होता है, जिसमें पितरों को याद किया है।
बचपन से जुड़ी हुई सराद की कई बातें याद हैं। बातों-बातों लोगों को सदा यही कहते सुना कि श्राद्ध के दिनों में पितर लोक से अदृश्य रूप में हमारे पितृ आत्मतृप्ति के लिए धरती तक आते हैं ताकि जल, तर्पण, पिंडदान और ब्रह्मभोज के बहाने वह तृप्त हो सकें। पहाड़वासी श्राद्ध के प्रति हमेशा सतर्क रहते हैं। कई दिन पहले ही बामन ज्यू (पुरोहित जी) को याद दिला दी जाती। हालांकि वह भी अपने यजमान के घर होने वाले श्राद्घ की तिथि अपने पंचाग या डायरी में लिखे रखते। चेली-बेटी, भांजे से लेकर आस पास की बहन बेटियों, बच्चे, बड़े आदि को ‘सराद का भात’ खाने का निमंत्रण दिया जाता, सराद के लिए खास सामग्री पहले ही क्रय कर ली जाती । इसके अलावा पूड़े, (हस्तार्घ,पादर्घ), पातली के लिए तिमिल के चौड़े पत्ते, आंवले या दाड़िम की पत्तियां, पवित्री-मौड़े के लिये कुश की व्यवस्था के अलावा जौं-तिल और श्राद्ध कर्म के लिए प्रयुक्त होने वाले वर्तनों को साफ करना आदि।
दाल-चावल की साफ-सफाई, रायते के लिए ककड़ी कोरना, उड़द भिगोना, श्राद्ध के उपयोग के आने वाले बर्तनों, रसोई के बर्तनों को साफ करना ताकि कोई अशुद्धता न रहे। आज तो लोगों के घरों में टाइल्स, पत्थर बिछे होते हैं, तब रसोई और देली (मुख्यद्वार) को लीप-घस कर देली में जौं के दाने विखेरे जाते । यह पितरों के प्रति श्रद्धा भाव ही कहा जायेगा कि सराद की रसोई में खड़ी दाल, भात, गाबे की थेचडी, पूरी, बड़े, रायता, चटनी, लसपस खीर, सलाद के लिए ककड़ी, मूली तो, पातली में भोज्य पदार्थों सहित दाड़िम के गुदे, अखरोट की गुदे(गिरी), अदरक का टुकड़ा आदि सब बनाया जाता।
तब आज की तरह परिवार छोटे नहीं थे, संयुक्त परिवार का चलन था। श्राद्ध की तिथि को परिवार का हर एक सदस्य स्वतः काम में हाथ बटाता। कोई रायता बनाता, किसी का काम चटनी बनाना, एक सदस्य सब्जी काट रहा होता तो दूसरा आटा गूँदता और कोई बहू-बेटी भिगाये मास(उड़द) को धो कर सिल बट्टे में पीसती नजर आती थी।
एक तरफ शुद्ध तरीके से भोजन पकने लगता तो दूसरी ओर पुरोहित जी की इंतजारी होती रहती। उन दिनों पहाड़ के ज्यादातर गाँव सड़क सुविधा से नहीं जुड़े थे। यातायात के भी पर्याप्त साधन नहीं थे। अशोज(आश्विन)के महीने का तेज घाम या फिर शरदिया झडों (बारिश) में पसीने से लतपथ पंडित जी दूर-दूर के गाँव-घरों से सराद कराते हुए आते। जब तक वह यजमान के घर थोड़ा सुस्ताते, तब तक कोई पीतल के बड़े गिलास में चहा (चाय) ले आता। पंडितजी कुशल क्षेम भी पूछते रहते और चाय की चुस्की लेते हुए सराद सामग्री भी देखते रहते। इसके बाद पहले तर्पण करवाया जाता, फिर मंत्रोंचार के बीच श्राद्ध का कर्म भी करीब एक घंटे तक चलता रहता। पातली, पिण्डारचन आदि समस्त कर्म कराने के बाद पण्डित जी सबको आशीष देते। फिर पण्डित जी को दान-दक्षिणा देकर आदरपूर्वक विदा किया जाता।
परम्परा अनुसार धोती पहन कर खाने वाले लोगों जैसे- पंडितजी और घर के सयाने, मेहमान पहले भोजन करते। इसके बाद बच्चों की बारी आती “सराद का भात” खाने की। आज भी कभी-कभी ये ख़याल आता है कि हम बच्चों के लिये पहले ही भोजन क्यों नहीं परोसा जाता था? खैर जिस घर के बच्चे नहीं आ पाते, उनके घर तक एक थाली में सराद का भात और अन्य स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ पहुँचाने का रिवाज था। कभी ये भी ध्यान आता है आज जिस गति से पहाड़ के गांवों में पलायन हो रहा है और पहाड़ के लोग शहरों में बसते जा रहे हैं, फिर भी श्राद्ध की परम्परा से विमुख नहीं हुए हैं। हाँ ये बात अवश्य है कि आज के बच्चे शहरों में हमारे बचपन जैसा “सराद का भात” खाने का सामुहिक आनन्द लेने से अवश्य वंचित हैं। इस तरह देखा जाय तो पितरों के प्रति श्रद्धा भाव से उन्हें याद किये जाने की श्राद्ध परम्परा आज तक चली आ रही है। यही तो हमारी आदर्श पर्व-परम्परा और संस्कृति है।
© भगवत प्रसाद पाण्डेय
पाटन-पाटनी (लोहाघाट)
दि. २५ सितम्बर २०२१
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