जंतर-मंतर में गालियां: गाली-गलौज का समाजशास्त्र
1 August 2026. हाल ही में प्रश्नपत्र लीक के विरोध में कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा आयोजितप्रदर्शन में पोस्टरों, बैनरों, नारों और सोशल मीडिया रीलों के माध्यम सेव्यापक रूप से अपमानजनक एवं अशोभनीय भाषा का प्रयोग किया गया।सार्वजनिक आंदोलनों में इस प्रकार की गाली-गलौज आखिर क्या संकेतदेती है? क्या यह पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी, पारिवारिक संस्कारों की कमी, शिष्टाचार के क्षरण और नैतिक मूल्यों के पतन का द्योतक है? क्यासार्वजनिक स्थानों पर किशोरों और युवाओं द्वारा इस प्रकार की भाषा काप्रयोग असभ्य और असंस्कृत व्यवहार नहीं है? क्या यह इस बात का भीसंकेत नहीं है कि हम अपने बच्चों का पालन-पोषण घरों और शिक्षणसंस्थानों में किस प्रकार कर रहे हैं?
नैतिक मूल्य किसी भी समाज में सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिएअत्यंत आवश्यक होते हैं। इनका पहला पाठ परिवार में मिलता है और बादमें विद्यालय तथा समाज इन्हें सुदृढ़ करते हैं। पहले के समय में यदि बच्चेया युवा सार्वजनिक स्थानों पर अभद्र भाषा का प्रयोग करते थे, तो बड़े-बुज़ुर्गउन्हें तुरंत टोकते और सुधारते थे। आज स्थिति बदल गई है। अधिकांश लोगहस्तक्षेप करने से बचते हैं, क्योंकि उन्हें विरोध या अप्रत्याशित प्रतिक्रिया काभय रहता है। मुझे एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी द्वारा सुनाई गई घटना यादआती है। उन्होंने सड़क पर एक व्यक्ति को अपनी पत्नी की पिटाई करते देखाऔर बीच-बचाव किया। किंतु उनकी चिंता की सराहना करने के बजाय उसमहिला ने ही कहा, “आप कौन होते हैं मेरे और मेरे पति के बीच हस्तक्षेपकरने वाले?”बहुत से लोग मित्रों और सहकर्मियों के बीच सामान्य बातचीत में भीगाली-गलौज का सहज रूप से प्रयोग करते हैं। बच्चे घर, बाज़ार, सड़क, बस, ट्रेन तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर इन शब्दों को सुनते हैं। वे अनजानेमें बड़ों की टेलीफोन पर होने वाली बातचीत से भी ऐसी भाषा सीख लेते हैं।अनेक माता-पिता यह मानकर चलते हैं कि उनके बच्चे इन शब्दों को न तोसमझते हैं और न ही उनका प्रयोग करते हैं। वास्तविकता इसके विपरीत है।आज स्कूल जाने वाले अनेक बच्चे ऐसी गालियों से परिचित हैं और अपनेसाथियों के बीच उनका प्रयोग भी करते हैं। स्टैंड-अप कॉमेडी और सोशलमीडिया ने इस प्रवृत्ति को और सामान्य बना दिया है, जिससे कम उम्र के बच्चेभी लगातार ऐसी भाषा के संपर्क में आ रहे हैं।जब आम नागरिक सार्वजनिक स्थानों, विशेषकर जंतर-मंतर जैसे विरोधप्रदर्शनों में, इस प्रकार के अपमानजनक नारे सुनते हैं, तो वे स्वाभाविक रूपसे आहत और असहज महसूस करते हैं।समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो प्रत्येक समाज में अपमानजनक शब्दों काअपना एक शब्दकोश होता है। विभिन्न संस्कृतियों में प्रचलित अनेक गालियाँरक्त-संबंधों के भीतर यौन संबंध (अनाचार) से जुड़ी होती हैं, जिसे लगभगसभी समाजों में वर्जित माना जाता है। अनेक गालियाँ माँ, बहन और बेटी केसंदर्भ में दी जाती हैं। अन्य गालियाँ यौन अभिविन्यास, स्त्री-पुरुष जननांगोंअथवा मानव जीवन के अत्यंत निजी पक्षों को लक्ष्य बनाती हैं।भारत सहित अनेक पारंपरिक समाजों में यौन संबंधों को विवाह संस्था केभीतर ही स्वीकार्य माना जाता है। इसलिए “कुत्ता”, “कुतिया” और “वेश्या” जैसे शब्द अपमानसूचक गालियों के रूप में प्रयुक्त होते हैं। इसी प्रकार दलाल शब्द भी नकारात्मक अर्थ रखता है, जबकि भड़वा जैसे शब्दवेश्यावृत्ति और मानव तस्करी से जुड़े होने के कारण और अधिकअपमानजनक माने जाते हैं। वैचारिक अथवा राजनीतिक मतभेद चाहे जितनेभी हों, प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के विरुद्ध इसप्रकार की अभद्र भाषा का प्रयोग निंदनीय है।इतिहास साक्षी है कि नारों ने स्वतंत्रता संग्राम, किसान आंदोलनों, श्रमिकसंघर्षों और छात्र आंदोलनों को प्रेरित किया है। वे लोगों में आशा, ऊर्जा औरउद्देश्य का संचार करते रहे हैं। पहले की पीढ़ियों के नारे रचनात्मकता, गरिमाऔर शालीनता के प्रतीक थे। इसके विपरीत, हाल के वर्षों में विशेषकरजेन-ज़ेड के कुछ आंदोलनों में अश्लील, अपमानजनक और अभद्र भाषा काप्रयोग बढ़ता दिखाई देता है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और अधिकबढ़ावा दिया है। कुछ लोग कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले वर्दीधारीकर्मियों तक के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने लगे हैं।यदि इस प्रकार की प्रवृत्ति पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो यहपरिवार और समाज में शिष्टाचार एवं सभ्यता के निरंतर ह्रास का कारण बनसकती है, कानून-व्यवस्था के लिए नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकती है औरअंततः राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।निस्संदेह प्रश्नपत्र लीक एक गंभीर समस्या है और इस पर कठोर कार्रवाई आवश्यक है। किंतु इसके साथ-साथ भारत के युवाओं की शिक्षा-पद्धति, मूल्यपरक शिक्षा और नैतिक विकास पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए।
देवेंद्र कुमार बुडाकोटी
लेखक समाजशास्त्री हैं, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्वछात्र हैं तथा उनके शोध का उल्लेख नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री प्रो. अमर्त्य सेन की पुस्तकों में किया गया है।
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